USD/KRW दूसरी तिमाही में औसतन 1,500 वोन से ऊपर, मुद्रा संकट के बाद पहली बार
दूसरी तिमाही में वोन-डॉलर विनिमय दर औसतन 1 डॉलर पर 1,500 वोन से ऊपर पहुंची, जो एशियाई मुद्रा संकट के बाद पहली बार है। दर लगातार 29 कारोबारी दिनों तक 1,400 वोन के दायरे में वापस नहीं आई। आयातकों, यात्रियों, विदेश में पढ़ने वालों और डॉलर देनदारियों वाली कंपनियों पर वोन में लागत बढ़ रही है।

दूसरी तिमाही में वोन-डॉलर विनिमय दर ऊंचे दायरे में चली गई। औसत दर 1 डॉलर पर 1,500 वोन से ऊपर रही, एशियाई मुद्रा संकट के बाद पहली बार। यह केवल एक दिन की उछाल नहीं है, बल्कि कोरिया में कंपनियों के डॉलर भुगतान और परिवारों की मुद्रा बदलने की लागत का नया ऊंचा स्तर है।
1,500 वोन का नया आधार
दर लगातार 29 कारोबारी दिनों तक 1,400 वोन के दायरे में वापस नहीं आई। इसका मतलब है कि आयातकों और विदेश पैसा भेजने वाले परिवारों ने पूरी तिमाही ऊंचे विनिमय दर का बोझ उठाया। तेल, गैस, अनाज और धातुओं का वोन में खर्च बढ़ा, जबकि निर्माताओं को मार्जिन बचाने और कीमत बदलने के बीच फैसला करना पड़ रहा है।
कोरिया में लागत दबाव
उपभोक्ता असर को यात्रा, विदेशी पढ़ाई, ऑनलाइन खरीद, ईंधन और खाद्य कीमतों में महसूस कर सकते हैं। बैंकों और कंपनियों के लिए विदेशी मुद्रा तरलता, छोटी अवधि के विदेशी ऋण और हेज प्रबंधन अधिक अहम हो गया है। आगे की दिशा डॉलर, अमेरिकी दरों की उम्मीद, व्यापार संतुलन और विदेशी निवेश प्रवाह पर निर्भर करेगी। डॉलर नरम हुआ तो 1,400 का दायरा फिर खुल सकता है, लेकिन 1,500 से ऊपर औसत अब ऊंची दर की योजना जरूरी बनाता है।
मुख्य बातें
- दूसरी तिमाही में वोन-डॉलर विनिमय दर औसतन 1 डॉलर पर 1,500 वोन से ऊपर पहुंची, जो एशियाई मुद्रा संकट के बाद पहली बार है। दर लगातार 29 कारोबारी दिनों तक 1,400 वोन के दायरे में वापस नहीं आई। आयातकों, यात्रियों, विदेश में पढ़ने वालों और डॉलर देनदारियों वाली कंपनियों पर वोन में लागत बढ़ रही है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दूसरी तिमाही का औसत 1,500 वोन से ऊपर होने का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है कि डॉलर भुगतान की लागत पूरी तिमाही ऊंची रही, जो एशियाई मुद्रा संकट के बाद पहली बार है।
दर कितने समय से 1,400 वोन दायरे में नहीं लौटी?
दर लगातार 29 कारोबारी दिनों तक 1,400 वोन के दायरे में वापस नहीं आई।
कोरियाई उपभोक्ताओं पर क्या असर पड़ेगा?
विदेश यात्रा, शिक्षा, विदेशी खरीद और आयातित ऊर्जा व खाद्य वस्तुओं की वोन में लागत बढ़ सकती है।
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